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#20.किसान और प्रकृति

निर्बल दुर्बल खेतिहारी पर,
सूखे की मार भारी है,
पकी फसल पर वारिस पत्थर,
और भी प्रलयंकारी है।

वह झूल रहा है फंदो से,
रब रूठ गया है बंदो से,
ऐ रब अब तू सुन ले तेरे,
बंदो पर संकट भारी है।

चिडियों की चहक भी मन्द हुई,
मुर्गों की बांग भी झूठी है,
कहीं अति गर्मी बेमौसम बारिस,
देखो प्रकृति हमसे रूठी है।

काट डाले वृक्ष जंगल,
दूषित कर दी नदियां सारी,
घट घट बालू खोद निकाले,
इति नदियां प्रलयंकारी।

खोद खोद पाषाण कूट से,
मघों को क्रोध दिलाया है,
कहीं अति वर्षा दे कर इननें,
कहीं बूंदो को तरसाया है ।

सरकार की नीति बेअसर,
बूंदो की मारा मारी है,
निर्बल दुर्बल खेतिहारी पर,
सूखे की मार भारी है।

 


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Hindi Poem on farmer and nature

Poem on farmer and nature in hindi

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jk namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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