poem on savan for nature
poem on savan for nature

#41-सुहाना सावन

भौरों की होती गुंजार यहां, चिडियो की चहक निराली है,सूरज की चमक भी मद्दम है, छाई घनघोर छटा निराली है,पुष्पों की महक चिडियों की चहक, भौरों का गुंजार सूरज का चमकता हार,मनमोहक दिल…

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#40- भागे तो थे

हम तो तन्हा दूर ही थे तुमसे,बस दिल में पास आने के अरमान जागे तो थे,रह गये इतने पीछे हम वक्त,बेवक्त कदम मिलाने को भागे तो थे ।बिछड जाने के…

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#39-कवि

शब्दों को पिरोना और गूंथ देना एक माले की तरह । आसां नहीं है इस जग में,यूं शब्दों से छेंड-छांड करना,अनर्गल सी लगती हैं बातें तुरन्त,महंगा पड जाता है यूँ…

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poem on anger
poem on anger and life

#38-तो गुस्सा आता है

बडी बडी बातें करनें वालों की बात आगर करता हूँ,तो गुस्सा आता है।देश का किसान हर पल झूल रहा है,जवान शरहद पर जूझ रहा है,इत भीतर बैठ गर कोई अफशोष…

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#37-राज की राजनीति

राज की जो राजनीति करेगा, वह ज्यादा टिक न पाएगा। आखिर लकडी की हांडी को, कब तक भटठी चढाएगा,दूध से जो जला इस जग में, मट्ठा फूंक कर पीता है,जनता…

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