#39-कवि

poem on poet

शब्दों को पिरोना और गूंथ देना एक माले की तरह ।

आसां नहीं है इस जग में,
यूं शब्दों से छेंड-छांड करना,
अनर्गल सी लगती हैं बातें तुरन्त,
महंगा पड जाता है यूँ खिलवाड करना,
शब्दों से खेलता है कवि ऐसे,
फूल गूथते एक माली की तरह,
बडा ही आसां लगता है उसे,
शब्दों को पिरोना और गूथ देना एक माले की तरह ।

कवि की कला ऐसी जो,
बांधे दुनिया के श्रोता को,
शब्दों की उस रंगोली से,
रंग दे सब को अपने रंग में,
जब तक शब्दों की माला फेरे,
ढाल दे स को अपने ढंग में,
असमंजस हो खुशी श्रंगार हो,
बात वीर की हो या समाज की,
सबका खयाल रखता है कवि,
इक जिम्मेदार खयाली की तरह,
कवि को ही आता है-
शब्दों को पिरोना और गूंथ देना एक माले की तरह ।

HINDI POEM ON KAVI- POET

SHABDO KO PIRONA AUR GOOTH DENA EK MAALE KI TARAH.

AASAN NAHIN HAI IS JAG ME,
YU SHABDO SE CHHED-CHHAD KARANA,
ANARGAL SI LAGATI HAI BAATE TURANT,
MAHANGA PAD JAATA HAI YU KHILWAD KARANA,
SHABDO SE KHELATA HAI KAVI AISE,
PHOOL GUTHATE EK MALI KI TARAH,
BADA HI AASAAN LAGATA HAI USE,
SHABDON KO PIRONA AUR GOOTH DENA EK MAALE KI TARAH

KAVI KI KKALA AISI JO,
BANDHE DUNIYA KE SHROTA KO,
SHABDON KI US RANGOLI SE,
RANG DE SAB KO APANE DHANG ME,
ASAMANJAS HO KHUSHI SHRANGAR HO,
BAAT VEER KI HO YA SAMAAJ KI,
SABAKA KHAYAAL RAKHATA HAI KAVI,
IK JIMMEDAAR KHAYALI KI TARAH,
KAVI KO HI AATA HAI-
SHABDO KO PIRONA AUR GOOTH DENA EK MAALE KI TARAH.

 


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