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Bakhani

Bakhani Posts

#26-ऐ बेटी तू देश की

तुझमें सबको गर्व, फक्र से सर ऊंचा कर हम चलते हैं,
माँ की कोख से लेकर, बहन की राखी संग ले चलते हैं,
बीवी बन कर रख खयाल, तू देश को पीढी देती है,
हर रूप से हमको संभाल कर, तू न चिन्ता करती अपने वेश की,
ऐ बेटी तू देश की।

सीता से द्रोपती तक, मीरा से लक्ष्मी तक, हर रूप तूने……
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#25-ARE WE INDEPENDENT?

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देश हुआ आजाद हुए अब हो गए हैं दिन इतने,

जो सच पूछो दिल से बोलो आजाद रहे हम दिन कितने

……..

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#24-RET KE DARIYA

मैंने रेत का दरिया मुठ्ठी बाँधी।
जग में यूँ हि राह चलूं,
विश्वास समय के साथ चलूं,
पर समय का पहिया आगे काफी,
न पाऊँ दिन रात चलूँ,
मैं भूल बिसर कर चलता जाऊँ,
सब कुछ खोऊँ कुछ न पाऊँ,
अस्त व्यस्त कर दे जीवन,
ऐसी चली ये आँधी,
मैंने रेत का दरिया मुठ्ठी बाँधी।

मैं मूरख अज्ञान गगन में,
विम्ब विलोकत वक्त बिताऊँ,
आगे बढनें की चाह अनोखी,
पर पीछे ही रह जाऊँ,
दुनिया में सब हास उडाएं,
शांत रहूँ कुछ कर न पाऊँ,
हास विलास पर हित पर,
फिर भी ढूंढू बैसाखी,
मैंने रेत का दरिया मुठ्ठी बाँधी।

भूल गया मैं जग में सब से
अलग थलग सा रहता हूँ,
भुला दिया मुझे जग में सब,
खुद से बस ये कहता हूँ,
समय का धारा बहती निश छण,
मैं अलग सा बहता हूँ,
पूरब पश्चिम का मेल अनोखा,
फिर भी मन है बैरागी,
मैंने रेत का दरिया मुठ्ठी बाँधी।
प्रभु मात पिता के चरणों में रहता हूँ,


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#23-बुंदेलखण्ड

न देखी किसी ने दशा वो मेरी,
बस हंसते रहे मुस्कुराते रहे,
मेरी दशा को उथला दिखा,
जग को धता बस दिखाते रहे,
दिखता है जो क्या बस वो सच है,
जो न दिखे वो भी तो सच है,
सूखा पडा न जल की बूद है,
अस्तित्व अपना अब खो रहा,
मैं बुन्देलखण्ड हूँ रो रहा।

इतिहास मेरा गोरवान्वित करे,
धडकन बन सम्मानित करे,
कभी सूरज अंगारे बरसाए,
कभी इन्द्र बज्र प्रहार करे,
पहले मैं खुशहाल था अब,
मची हर तरफ हा-हा कार,
मेरा किसान है झूल रहा,
हर घर कोना अब चीख रहा,
मैं बुन्देलखण्ड हूँ रो रहा।

चीरा सीना सोना जिनने उगलाया,
मुझको सोने की चिडिया था कभी कहलाया,
वो रो रहे हैं बिलख रहे हैं,
मानस तप सा सुलग रहे हैं,
लूट लूट पाषाण रज नद से,
मानष जन को दे तडप रहे हैं,
हर पल हर जन बस अब देखो,
बूंद बूंद को बिलख रहा,
मैं बुन्देलखण्ड हूँ रो रहा।

मैं खामोश हूँ थोडा बेहोस हूँ,
अपनी हालात में थोडा मदहोस हूँ,
मैं तो हंसता हुआ एक प्रतिविम्ब हूँ,
मन में उठते सवालों का एक विम्ब हूँ,
खामोस हूँ तो नहीं क्रोध में,
मुस्कुराऊँ अगर तो नहीं सुख में,
मुस्कुरा रहा हूँ नहीं चीख रहा,
दुनिया से लडना मैं अब भी सीख रहा,
मैं बुन्देलखण्ड हूँ रो रहा।


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#22-ओ माँ

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तुझे मेरी हर पल जो चिन्ता रहती है,
आंखो के नीचे की सुर्ख झुर्रियां कुछ कहती हैं,
इक शान्त निश्छल आश की धारा बहती है,
क्या मैं कर दूँ कुछ मुझे आता नहीं,
ओ माँ।……

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