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Bakhani

Bakhani Posts

#21-दृढ बनो

निकला था अलि भ्रमर में,
अंजानें मंजिल की खोज,
दिल में आश लगाए भटके,
मन में मंजिल पानें की सोंच,
राह भटकते रात हुई वह,
लौट पडे निज गृह को तेज,
स्वप्न में भी मंजिल को ढूंढे,
निकल पडे गृह को छोड,
निकला था अनि भ्रमर में,
अंजाने मंजिल की खोज।

आश न छोडे चाह न छोडे,
निकले दिन प्रति दिन वह,
बिना राह के मंजिल ढूंढे,
पूंछे मंजिल पुष्पों से वह,
राह के हर पुष्प से करे,
मंजिल की कडी जांच,
तोडे न दिल की आश,
दृढता की जरूरत आज,

शुरू करो जिस को,
अन्त करो पाओ परिणाम,
सभी मुश्किलों से लडो,
निकल जाए चाहे तुम्हरे प्राण।


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दृढता की जरूरत आज

इस हिन्दी कविता के माध्यम से आज के समय में दृढता की जरूरत को दर्शाया गया है। इस दृढता के लिए उदाहरण दिया गया है एक भौंरे (भ्रमर) का जो प्रतिदिन हर पुष्प से आलिंगन करता सा दिखता है जिसमें कल्पना की गयी है कि वह भौंरा प्रतिदिन अपने आशियाने से निकल कर प्रत्येक पुष्प से जिससे मिलता है बडे ही धीर भाव से अपनी मंजिल के बारे में पूंछता है।

Hindi Poem on consistent

Poem on consistent in hindi

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Hindi Kavita on be consistent

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#20.किसान और प्रकृति

निर्बल दुर्बल खेतिहारी पर,
सूखे की मार भारी है,
पकी फसल पर वारिस पत्थर,
और भी प्रलयंकारी है।

वह झूल रहा है फंदो से,
रब रूठ गया है बंदो से,
ऐ रब अब तू सुन ले तेरे,
बंदो पर संकट भारी है।

चिडियों की चहक भी मन्द हुई,
मुर्गों की बांग भी झूठी है,
कहीं अति गर्मी बेमौसम बारिस,
देखो प्रकृति हमसे रूठी है।

काट डाले वृक्ष जंगल,
दूषित कर दी नदियां सारी,
घट घट बालू खोद निकाले,
इति नदियां प्रलयंकारी।

खोद खोद पाषाण कूट से,
मघों को क्रोध दिलाया है,
कहीं अति वर्षा दे कर इननें,
कहीं बूंदो को तरसाया है ।

सरकार की नीति बेअसर,
बूंदो की मारा मारी है,
निर्बल दुर्बल खेतिहारी पर,
सूखे की मार भारी है।

 


–>सम्पूर्ण कविता सूची<–


Hindi Poem on farmer and nature

Poem on farmer and nature in hindi

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#19.हैप्पी होली

इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी यह होली।

रंगो की वह होली अब फीकी फीकी सी है,
सहमी इंसानियत हर पल दूजे से,
न पता किधर से रोष ठगे,
इक विकास न जाने कैसे,
कारण दूजे का आक्रोश जगे,
जो भाव रंगों में दिखते थे,
कभी नभ रंग कर,
चेहरे में वो दुःभाव,
आंखे रोष से नीली पीली सी हैं,
सुख झलकता था जिनमें कभी,
पलकें भीगी भीगी सी हैं
रंगो की वह होली अब फीकी फीकी सी है।

होली की कैसे शुभकामनाएं बटोर लूँ,
फीके रंग की बेमन वाणी भला कैसे टटोल लूं,
मन जो विश्वास भरा था टूट गया,
वह वर्षों का साथ अचानक छूट गया,
मन जो भाव भरे थे लुट से गये,
सुख झलकता था जिनमें कभी,
पलकें भीगी भीगी सी हैं,
रंगों की वह होली अब फीकी फीकी सी है।

भविष्य में होली के एण्ड्रयड ऐप होंगे,
लोग रंग विरंगी तस्वीरें भेजेंगे एक दूजे को,
गुजिया पपडी की जगह चाकलेट खाएंगे वो,
मुस्कुराएंगे चले जाएंगे यू हि न कहेंगे हैप्पी होली,
इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी यह होली।


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Hindi Poem on happy holi

Poem on happy holi in hindi

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#18-सुन गौरैया कहाँ गई तू

 

सुन गौरैया वर्षों पहले मेरा आंगन महकाती थी,

मेरा बचपन फुदक तेरे संग,
उछल कूद सिखाती थी,
डालूं दाना आंगन में जितने,
तू आ के चुंग जाती थी,
मेरे आंगन का पेड सुनहरा,
रहता तेरा सुन्दर बसेरा,
सांझ ढले तू भी सो जाती,
चहके मन मोहे जब होए सबेरा।

ऐ गौरैया कहाँ गई तू,
लौट के आ जा जहाँ गई तू,
बिन तेरे अब आंगन सूना,
दुनिया तुझको धता बताती,
मेरा आंगन चहक महक से,
तू हर पल बरसाती थी,
सुन गौरैया वर्षों पहले मेरा आंगन महकाती थी।


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हिंदी कविता-

गौरैया (the sparrow) एक ऐसी चिडिया है जो आज कल अपना अस्तित्व खोती सी दिख रही है। एक समय था जब चहल पहल व भागम भाग भरी जिंदगी नहीं थी इस दुनिया में। उस समय गौरैया आराम से घर के आंगन में आकर चहल कदमी करती थी। पर जब से मोबाइल क्रांति हुई कई प्रजाति की चिडियाँ अपना अस्तित्व खोती सी दिख रही हैं।

Hindi Poem on sparrow

Poem on sparrow the bird gauraiya in hindi

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#17-महिला सशक्तिकरण

समाज की कुरीतियों से अब,
लड़ना हमनें सीख लिया,
फटेहाल समाज का मुह,
सिलना हमनें सीख लिया,

हक़ की हो जब बात तो,
छीनना हमनें सीख लिया,
इस बेदर्द समाज में खुलकर,
जीना हमनें सीख लिया।

कब तक यूँ दबी कुचली सी,
हालत में रहेंगे,
जमाने के डर नें सर,
नीचे करा रखा था,

डरा रखा था हर कदम,
सितम ढाया था बेवजह,
स्वातंत्र्य की महक जो,
फैली यूँ हर तरफ,

स्वछन्द रह कर कंधे से,
कन्धा मिलाया है हमने,
जब भी सर उठा कर,
चलनें की कोशिश की हमनें,

दबा दिया था डरा कर सर नीचे पर,
सर उठा कर चलना हमनें सीख लिया,
समाज की हर कुरीतियों लड़कर,
आखिर जीना हमनें सीख लिया।


–>सम्पूर्ण कविता सूची<–


Hindi Poem on women empowerment

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महिला दिवस

आज की नारी -नारी सशक्तिकरण

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