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#56 भारत और कोरोना के खिलाफ जंग

जग आश लगाए देख रहा,
सायद कोई इक राह मिले,
जनता कर्फ्यू व लाकडाउन से,
कोरोना से सब बच निकले,
पर हम उन्मत्त चूर नशे में,
क्यों भला कोई अपील सुनें,
तुम क्या कहते जग क्या कहता,
चाहे ऐसे कितनें प्रश्न मिलें।

अनुशासन सायद न सीखा,
न कदर करें अनुशासन की,
बात को जरा हम ही न सुनें,
और गलती सारी प्रशासन की,
किसमें हिम्मत जो फरमान सुनाए,
क्या करना ये हमें बताए,
मर्जी अपनी अब मरना है,
जरूरत क्यों हमें सुधरना है,
परिवार की भला खुद क्यों सोंचे,
करे जिसको जो करना है,
आज खाली सडक जो मिली,
सायद ऐसी फिर न मिले।

राजनीति हर रोम में बसी,
वर्दी की कदर नहीं,
क्या क्या संग में हो सकता,
है सायद इसकी खबर नहीं,
उन्मत्त नशे में चूर जायजा-
लेने घर से निकल पडे,
कुछ मजबूर को छोड कर,
सायद यह अवसर फिर न मिले।

 


–>सम्पूर्ण कविता सूची<–


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jk namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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